
सपनों को पंख तो मिले हैं,
मगर पैरों में बेड़ियां है।
कुछ छोटे सपनों के बदले,
बड़ी नींद का सौदा करने,
निकल पड़े हैं पांव अभागे,
जाने कौन डगर ठहरेंगे!

सपनों को पंख तो मिले हैं,
मगर पैरों में बेड़ियां है।
वही प्यास के अनगढ़ मोती,
वही धूप की सुर्ख कहानी,
वही आंख में घुटकर मरती,
आंसू की खुद्दार जवानी।

सपनों को पंख तो मिले हैं,
मगर पैरों में बेड़ियां है।
हर मोहरे की मूक विवशता,
चौसर के खाने क्या जाने हार,
जीत तय करती है वे,
आज कौन से घर ठहरेंगे।
निकल पड़े हैं पांव अभागे,
जाने कौन डगर ठहरेंगे!
सपनों को पंख तो मिले हैं,
मगर पैरों में बेड़ियां है।
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Beautifully penned. Loved each emotion.
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Thank you 😊
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